may14

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

geeta saar in hindi




                 करिष्ये वचनं तव .....

 दोस्तों महाभारत आज भी जारी है हमारे मन मे !  आज भी अर्जुन यानी हम  मोहग्रस्त है !  मन हमे अपने कर्त्तव्य पथ से पीछे खींच रहा है ! आलस और डर हमे कर्त्तव्य पथ पर आरूढ़ नहीं होने दे रहे हैं !   दुर्बलता हम पर हावी हो रही है !   काम से ज्यादा उसके परिणाम की चिंता हमे खाए जा रही है !   मन जकड रहा है , तन निढाल है !  सामने कामों का पहाड़ है !    अवसर हाथ से निकला जा रहा हैं !   हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं !   है ना ?
उठिए ,  हताशा छोड़िये,  गीता के वचनों से अपने आप को चार्ज कीजिये और चल पड़िए अपने लक्ष्य की तरफ ,  जल्दी कीजिये   समय हाथ से रेत की तरह फिसला जा रहा है ................


कुरुक्षेत्र के मैदान मे कोरवों और पांडवों की सेनायें आमने -सामने आ चुकी थी !   युद्ध प्रारंभ होने ही वाला था !   पांडवों की कमान अर्जुन के हाथों मे थी !   तभी सामने  कोरवों की सेना मे अपने पितामह भीष्म ,  गुरु द्रोणाचार्य ,  कृपाचार्य,  और अपने कोरव भाइयों को देख कर अर्जुन अचानक मोहग्रस्त हो गया ,  उसका मनोबल कमजोर पड़ने लगा ,  मन पलायनवादी होने लगा ! सात अक्षोहिनी सेनाओं का महाबली केवट  विकलता के क्षण मे पतवार फ़ेंक नौका को मझधार मे छोड़कर पलायन करने को तत्पर हो उठा !
कातर अर्जुन अपने सारथि श्री कृष्ण से गुहार कर उठा ---  "केशव ,मुझे ये राज्य नहीं चाहिये !   मुझे विजय नहीं चाहिये !   मुझे सुख नहीं चाहिये !   मुझे कुछ नहीं चाहिये !   मै अपने बंधुओं को नहीं मार सकता !   मैं युद्ध नहीं कर सकता ! मैं युद्ध नहीं करूँगा .........!

निर्णय के इन क्षणों मे अर्जुन की ऐसी कायरता और हताशा को देख पार्थसारथी विस्मय से भर अर्जुन को फटकार उठे -----
"असमय ऐसी क्लीवता !   ऐसा तो कोई श्रेष्ठ वीर नहीं करता !   ऐसे आचरण से तू स्वर्ग पाना चाहता है ?  हृदय की यह कैसी अनुचित दुर्बलता ! छोड़ दे ,  छोड़ दे ,  पार्थ  मन की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़ दे !   और हुंकार कर   उठ खड़ा हो वीरों की भांति   युद्ध करने ! "

  व्याकुल अर्जुन ने वेदना से भरे स्वर मे कहा -- ,'मधुसुदन !   पितामह और गुरुवर!  मै इन पर बाण कैसे चलाऊंगा ?  नहीं माधव ! नहीं !     असंभव !    मै  भिक्षा मांग कर अपना जीवन चला  लूँगा   पर युद्ध नहीं करूँगा !

"पार्थ भयभीत ना हो  ! मृत्यु से भयभीत ना हो !  तू सोचता है की अपने पितामह .गुरु और बंधुओं का वध यदि तू करेगा तो ही वे मृत्यु को प्राप्त होंगे ! और यदि तू उनका वध नहीं करेगा तो ये चिरायु हो जाएंगे ?  कितना बड़ा भ्रम है तेरा अर्जुन !   यह स्पष्ट समझ ले ,हर मनुष्य अपने कर्मफल के अनुसार मृत्युवरण करता है !   तू किसी की मृत्यु का कारण नहीं !   पार्थ तू मात्र निमित्त है ..........! 

कर्म कर !  किन्तु परिणाम मे आसक्ति मत रख !   जय-पराजय जैसे कर्मफल से मुक्त होकर   अपना कर्त्तव्य पालन कर ! 

करना है इसलिए कर !
 कर्म के लिए कर्म कर ,  फल के लिए नहीं !  
 निर्विकार और निरपेक्ष भाव से कर्म कर !  
 यह मत सोच की कर्म का कर्ता तू है !   स्वयं को कर्म मे लिप्त ना कर क्योंकि तू करने वाला नहीं है !  
तू सोचता है की तू अपनी इच्छा से जो चाहे कर लेगा ,  तो यह तेरा भ्रम है !   जो तू चाहेगा वो ना होगा  और जो ना चाहेगा वो हो जाएगा !   क्योंकि नियामक तू नहीं !  तू पूरी शक्ति से चाह कर भी किसी को मार नहीं सकता और ना चाह कर भी तू मारेगा !

इसलिए अपने मन से अहंकार को निकाल दे कि  तू कर्ता है ! अतः अनासक्त भाव से अपना कर्त्तव्य पूरा कर !   परिणाम पर मत जा !   फल पर मत जा !

पार्थ !   यदि तू ईश्वर की उपासना करना चाहता है तो अपने कर्मों के द्वारा ही कर !   समर्पित कर दे अपने समस्त कर्म ईश्वर को !   जल मे रह कर भी जैसे कमल पत्र जल से ऊपर रहता है ,  उसी प्रकार कर्म करते हुए भी तू कमल पत्र की तरह कर्म से ऊपर उठा रह ......!

मै ही महाकाल हूँ अर्जुन ?  जो आज दिखाई देता है ,  वह कल ना रहेगा !  
 इसलिए तू उठ ,  खड़ा हो !   समय को पहचान और यशस्वी बन !

पार्थ ! मोह ,ममता ,संकोच ,डर सब त्याग दे !   यदि त्याग ना सके तो अपनी ये दोष दुर्बलताएँ मुझे सोंप दे !
आज तेरे सामने उज्जवल भविष्य का द्वार खुला हुआ है !   भाग्यवान मनुष्य ही ऐसा स्वर्ण अवसर पाते हैं !  और तू स्वर्ग द्वार पर पहुँच कर भी पलायन करना चाहता है ?

सोभाग्यशाली वीर !   उठ खड़ा हो ,  क्योंकि आज आत्मिक उन्नति भी तेरी मुट्ठी मे है और भोतिक प्रगति भी तेरी मुट्ठी मे है ,यश भी तेरी मुट्ठी मे है !  उठा ले लाभ इस पवित्र अवसर का !

उठ जा ! खड़ा हो जा ! गांडीव धारण कर ! युद्ध कर ! 

अर्जुन कर्मपथ पर दृढ चरणों से शिला के सामान खड़े हो चुके थे !  नेत्रों मे ज्वाला थी !   हाथों मे गांडीव और गांडीव मे टंकार !   उनके अधरों से एक दृढ स्वर निकला   "करिष्ये वचनं तव "
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ये आर्टिकल पूज्य गुरुदेव के ज्ञान के सागर की कुछ बूँदें हैं !
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यह भी देखें ---geeta saar in hindi -2  

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17 टिप्‍पणियां:

  1. Jaisa aapne kaha geeta ka mahatva hame samaghana chahiye,iski to Einstein tak ne prasansa ki hai,thanks for dis imp. blog

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  2. Geeta ka ye slok hamare jiwan ko sahi marg pe le jata hai or hame sochne samajhne ki sakti deta hai. Thanks for this slok.

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  3. it is really very true and good thought which i ever get,now i do belive tht BHAGWAT GEETA is most importent for us even every1

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  4. Bahut badhiya karya aapka, dhanyawad evam badhai !!

    -Vinayak

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  5. उत्तर
    1. Es sansar me sikcha ke liye gita updesh se aage khuch bhi nahi hai

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  6. nice geeta saar gives us a new way to spend our life in peaceful

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  7. Very nice explained, but you could add some sanskrit shlok also

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  8. Veryy nyccc...
    Plz god help me ...i need courage..

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  9. Geeta me kaha gaya tha ki jovhota h wo bhagawan ki marji se hota h fir jo papbhum karte h wo bhi to uski marji se hi hota hoga fir pap ka fal hame q milta h hamare kaha galte hoti h

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दोस्त, आपके अमूल्य comment के लिए आपका शुक्रिया ,आपकी राय मेरे लिए मायने रखती है !